सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

श्री बाबा बालक नाथ चालीसा॥दोहा॥गुरु चरणों में सीस धर करूँ प्रथम प्रणामबख्शो मुझको बाहुबल, सेव करूँ निष्कामरोम रोम में रम रहा, रूप तुम्हारा नाथदूर करो अवगुण मेरे, पकड़ो मेरा हाथ॥चौपाई॥बालक नाथ ज्ञान भंडारा।दिवस रात जपु नाम तुम्हारा॥तुम हो जपी तपी अविनाशी।तुम ही हो मथुरा के काशी॥तुमरा नाम जपे नर नारी।तुम हो सब भक्तन हितकारी॥तुम हो शिव शंकर के दासा।पर्वत लोक तुम्हारा वासा॥सर्वलोक तुमरा जस गावें।ऋषि मुनि सब नाम ध्यावें॥काँधे पर झोली विराजे।हाथ मे सुंदर चिमटा साजे॥सूरज के सम तेज तुम्हारा।मन मंदिर में करे उजारा॥बाल रूप धर गऊ चरावे।रत्‍नों की करी दूर बलावें॥अमर कथा सुनने को रसिया।महादेव तुमरे मन बसिया॥शाह तलाईयाँ आसान लाया।जिस्म विभूति झटा रमायें॥रत्‍नों का तू पुत्र कहाया।जिमिंदारो ने बुरा बनाया॥ऐसा चमत्कार तुमने दिखलाया।सबके मन का भ्रम मिटाया॥रिद्धि सिद्धि नवनिधि के दाता।मात लोक के भाग्य विधाता॥जो नर तुमरा नाम ध्यावें।जन्म जन्म के दू:ख बिसरावें॥अंतकाल जो सिमरण करहीं।सो नर मुक्ति भाव से मरहीं॥संकट कटे मीटे सब रोगा।बालक नाथ जपे जो लोगा॥लक्ष्मी पुत्र शिव भक्त कहाया।बालक नाथ जन्म प्रगटाया॥दुधाधारी सिर जटा सुहावै।अंग विभूति तन भस्म रमावे॥कानन कुंडल नैनन मस्ती।दिल मे बसे तेरी हस्ती॥अद्द्भुत तेज प्रताप तुम्हारे।घट-घट की तुम जानन हारे॥बाल रूप धरि भक्तन तारे।भक्तन के हैं पाप मिटाये॥गोरख नाथ सिद्ध जटाधारी।अजमाने आया तुम्हें पौणाहरी॥जब उस पेश गई न कोई।हार मान फिर मित्रता होई॥घट घट के अन्तर की जानत।भले बुरे की पीड़ पछानत॥सूक्ष्म रूप करे पवन अहारा।पौणाहरी हुआ नाम तुम्हारा॥दर पे जोत जगे दिन रैना।तुम रक्षक भय कोऊं है ना॥भक्त जन जब नाम पुकारा।तब ही उनका दुख निवारा॥सेवक उस्तति करत सदा ही।तुम जैसा दानी कोई नाही॥तीन लोक महिमा तब गाई।गौरख को जब कला दिखाई॥(अकथ अनादी भेद नहीं पाई)बालक नाथ अजय अविनाशी।करो कृपा घट घट के वासी॥तुमरा पाठ करे जो कोई।बन्धन छूट महा सुख होई॥त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारूँ।देहि दर्शन मोहे पार उतारो॥लै त्रिशूल शत्रुघन मारे।भक्त जनों के काज सवारें॥मात पिता बंधु और भाई।विपत काल पूछें नहीं कोई॥ढूधाधारी एक आस तुम्हारी।आन हरो अब संकट भारी॥पुत्रहीन इच्छा करे कोई।निश्चय नाथ प्रसाद ते होई॥बालक नाथ की गुफा न्यारी।रोट चढ़ावे जो नर नारी॥ऐतवार व्रत करे हमेशा।घर मे रहे न कोई कलेशा॥करूँ वंदना सीस निवाये।नाथ जी रहना सदा सहाये॥हम करें गुणगान तुम्हारा।भव सागर करो पार उतारा॥

श्री बाबा बालक नाथ चालीसा

॥दोहा॥

गुरु चरणों में सीस धर करूँ प्रथम प्रणाम
बख्शो मुझको बाहुबल, सेव करूँ निष्काम
रोम रोम में रम रहा, रूप तुम्हारा नाथ
दूर करो अवगुण मेरे, पकड़ो मेरा हाथ


॥चौपाई॥

बालक नाथ ज्ञान भंडारा।
दिवस रात जपु नाम तुम्हारा॥
तुम हो जपी तपी अविनाशी।
तुम ही हो मथुरा के काशी॥

तुमरा नाम जपे नर नारी।
तुम हो सब भक्तन हितकारी॥
तुम हो शिव शंकर के दासा।
पर्वत लोक तुम्हारा वासा॥

सर्वलोक तुमरा जस गावें।
ऋषि मुनि सब नाम ध्यावें॥
काँधे पर झोली विराजे।
हाथ मे सुंदर चिमटा साजे॥

सूरज के सम तेज तुम्हारा।
मन मंदिर में करे उजारा॥
बाल रूप धर गऊ चरावे।
रत्‍नों की करी दूर बलावें॥

अमर कथा सुनने को रसिया।
महादेव तुमरे मन बसिया॥
शाह तलाईयाँ आसान लाया।
जिस्म विभूति झटा रमायें॥

रत्‍नों का तू पुत्र कहाया।
जिमिंदारो ने बुरा बनाया॥
ऐसा चमत्कार तुमने दिखलाया।
सबके मन का भ्रम मिटाया॥

रिद्धि सिद्धि नवनिधि के दाता।
मात लोक के भाग्य विधाता॥
जो नर तुमरा नाम ध्यावें।
जन्म जन्म के दू:ख बिसरावें॥

अंतकाल जो सिमरण करहीं।
सो नर मुक्ति भाव से मरहीं॥
संकट कटे मीटे सब रोगा।
बालक नाथ जपे जो लोगा॥

लक्ष्मी पुत्र शिव भक्त कहाया।
बालक नाथ जन्म प्रगटाया॥
दुधाधारी सिर जटा सुहावै।
अंग विभूति तन भस्म रमावे॥

कानन कुंडल नैनन मस्ती।
दिल मे बसे तेरी हस्ती॥
अद्द्भुत तेज प्रताप तुम्हारे।
घट-घट की तुम जानन हारे॥

बाल रूप धरि भक्तन तारे।
भक्तन के हैं पाप मिटाये॥
गोरख नाथ सिद्ध जटाधारी।
अजमाने आया तुम्हें पौणाहरी॥

जब उस पेश गई न कोई।
हार मान फिर मित्रता होई॥
घट घट के अन्तर की जानत।
भले बुरे की पीड़ पछानत॥

सूक्ष्म रूप करे पवन अहारा।
पौणाहरी हुआ नाम तुम्हारा॥
दर पे जोत जगे दिन रैना।
तुम रक्षक भय कोऊं है ना॥

भक्त जन जब नाम पुकारा।
तब ही उनका दुख निवारा॥
सेवक उस्तति करत सदा ही।
तुम जैसा दानी कोई नाही॥

तीन लोक महिमा तब गाई।
गौरख को जब कला दिखाई॥
(अकथ अनादी भेद नहीं पाई)
बालक नाथ अजय अविनाशी।
करो कृपा घट घट के वासी॥

तुमरा पाठ करे जो कोई।
बन्धन छूट महा सुख होई॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारूँ।
देहि दर्शन मोहे पार उतारो॥

लै त्रिशूल शत्रुघन मारे।
भक्त जनों के काज सवारें॥
मात पिता बंधु और भाई।
विपत काल पूछें नहीं कोई॥

ढूधाधारी एक आस तुम्हारी।
आन हरो अब संकट भारी॥
पुत्रहीन इच्छा करे कोई।
निश्चय नाथ प्रसाद ते होई॥

बालक नाथ की गुफा न्यारी।
रोट चढ़ावे जो नर नारी॥
ऐतवार व्रत करे हमेशा।
घर मे रहे न कोई कलेशा॥

करूँ वंदना सीस निवाये।
नाथ जी रहना सदा सहाये॥
हम करें गुणगान तुम्हारा।
भव सागर करो पार उतारा॥

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

श्री राम जी चालीसा By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब ॥चौपाई॥श्री रघुवीर भक्त हितकारी, सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी।निशिदिन ध्यान धरै जो कोई, ता सम भक्त और नहिं होई॥ध्यान धरे शिवजी मन माहीं, ब्रह्मा इन्द्र पार नहिं पाहीं।जय, जय, जय रघुनाथ कृपाला, सदा करो संतन प्रतिपाला॥दूत तुम्हार वीर हनुमाना, जासु प्रभाव तिहूं पुर जाना।तव भुज दण्ड प्रचण्ड कृपाला, रावण मारि सुरन प्रतिपाला॥तुम अनाथ के नाथ गुंसाई, दीनन के हो सदा सहाई।ब्रह्मादिक तव पार न पावैं, सदा ईश तुम्हरो यश गावैं॥चारिउ वेद भरत हैं साखी, तुम भक्तन की लज्जा राखीं।गुण गावत शारद मन माहीं, सुरपति ताको पार न पाहीं॥नाम तुम्हार लेत जो कोई, ता सम धन्य और नहिं होई।राम नाम है अपरम्पारा, चारिहु वेदन जाहि पुकारा॥गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो, तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो।शेष रटत नित नाम तुम्हारा, महि को भार शीश पर धारा॥फूल समान रहत सो भारा, पाव न कोऊ तुम्हारो पारा।भरत नाम तुम्हरो उर धारो, तासों कबहुं न रण में हारो॥नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा, सुमिरत होत शत्रु कर नाशा।लखन तुम्हारे आज्ञाकारी, सदा करत सन्तन रखवारी॥ताते रण जीते नहिं कोई, युद्ध जुरे यमहूं किन होई।महालक्ष्मी धर अवतारा, सब विधि करत पाप को छारा॥सीता नाम पुनीता गायो, भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो।घट सों प्रकट भई सो आई, जाको देखत चन्द्र लजाई॥सो तुमरे नित पांव पलोटत, नवो निद्धि चरणन में लोटत।सिद्धि अठारह मंगलकारी, सो तुम पर जावै बलिहारी॥औरहु जो अनेक प्रभुताई, सो सीतापति तुमहिं बनाई।इच्छा ते कोटिन संसारा, रचत न लागत पल की बारा॥जो तुम्हरे चरणन चित लावै, ताकी मुक्ति अवसि हो जावै।जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूपा, निर्गुण ब्रह्म अखण्ड अनूपा॥सत्य सत्य सत्य व्रत स्वामी, सत्य सनातन अन्तर्यामी।सत्य भजन तुम्हरो जो गावै, सो निश्चय चारों फल पावै॥सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं, तुमने भक्तिहिं सब सिद्धि दीन्हीं।सुनहु राम तुम तात हमारे, तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे॥तुमहिं देव कुल देव हमारे, तुम गुरु देव प्राण के प्यारे।जो कुछ हो सो तुम ही राजा, जय जय जय प्रभु राखो लाजा॥राम आत्मा पोषण हारे, जय जय जय दशरथ के दुलारे।ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरूपा, नमो नमो जय जगपति भूपा॥धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा, नाम तुम्हार हरत संतापा।सत्य शुद्ध देवन मुख गाया, बजी दुन्दुभी शंख बजाया॥सत्य सत्य तुम सत्य सनातन, तुम ही हो हमरे तन मन धन।याको पाठ करे जो कोई, ज्ञान प्रकट ताके उर होई॥आवागमन मिटै तिहि केरा, सत्य वचन माने शिर मेरा।और आस मन में जो होई, मनवांछित फल पावे सोई॥तीनहुं काल ध्यान जो ल्यावै, तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै।साग पत्र सो भोग लगावै, सो नर सकल सिद्धता पावै॥अन्त समय रघुवरपुर जाई, जहां जन्म हरि भक्त कहाई।श्री हरिदास कहै अरु गावै, सो बैकुण्ठ धाम को जावै॥॥दोहा॥सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय।हरिदास हरि कृपा से, अवसि भक्ति को पाय॥राम चालीसा जो पढ़े, राम चरण चित लाय।जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्ध हो जाय॥

श्री राम जी चालीसा By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब ॥चौपाई॥ श्री रघुवीर भक्त हितकारी, सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी। निशिदिन ध्यान धरै जो कोई, ता सम भक्त और नहिं होई॥ ध्यान धरे शिवजी मन माहीं, ब्रह्मा इन्द्र पार नहिं पाहीं। जय, जय, जय रघुनाथ कृपाला, सदा करो संतन प्रतिपाला॥ दूत तुम्हार वीर हनुमाना, जासु प्रभाव तिहूं पुर जाना। तव भुज दण्ड प्रचण्ड कृपाला, रावण मारि सुरन प्रतिपाला॥ तुम अनाथ के नाथ गुंसाई, दीनन के हो सदा सहाई। ब्रह्मादिक तव पार न पावैं, सदा ईश तुम्हरो यश गावैं॥ चारिउ वेद भरत हैं साखी, तुम भक्तन की लज्जा राखीं। गुण गावत शारद मन माहीं, सुरपति ताको पार न पाहीं॥ नाम तुम्हार लेत जो कोई, ता सम धन्य और नहिं होई। राम नाम है अपरम्पारा, चारिहु वेदन जाहि पुकारा॥ गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो, तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो। शेष रटत नित नाम तुम्हारा, महि को भार शीश पर धारा॥ फूल समान रहत सो भारा, पाव न कोऊ तुम्हारो पारा। भरत नाम तुम्हरो उर धारो, तासों कबहुं न रण में हारो॥ नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा, सुमिरत होत शत्रु कर नाशा। लखन तुम्हारे आज्ञाकारी, सदा करत सन्तन रखवारी...

(श्री पार्वती माता की चालीसा) ॥दोहा॥जय गिरी तनये दक्षजे शम्भू प्रिये गुणखानि।गणपति जननी पार्वती अम्बे! शक्ति! भवानि॥॥चौपाई॥ब्रह्मा भेद न तुम्हरो पावे, पंच बदन नित तुमको ध्यावे।षड्मुख कहि न सकत यश तेरो, सहसबदन श्रम करत घनेरो॥तेऊ पार न पावत माता, स्थित रक्षा लय हित (हिय) सजाता।अधर प्रवाल सदृश अरुणारे, अति कमनीय नयन कजरारे॥ललित ललाट विलेपित केशर, कुंकुंम अक्षत शोभा मनहर।कनक बसन कंचुकि सजाए, कटी मेखला दिव्य लहराए॥कंठ मदार हार की शोभा, जाहि देखि सहजहि मन लोभा।बालारुण अनंत छबि धारी, आभूषण की शोभा प्यारी॥नाना रत्न जड़ित सिंहासन, तापर राजति हरि चतुरानन।इन्द्रादिक परिवार पूजित, जग मृग नाग यक्ष रव कूजित॥गिर कैलास निवासिनी जय जय, कोटिक प्रभा विकासिन जय जय।त्रिभुवन सकल कुटुंब तिहारी, अणु अणु महं तुम्हारी उजियारी॥हैं महेश प्राणेश तुम्हारे, त्रिभुवन के जो नित रखवारे।उनसो पति तुम प्राप्त कीन्ह जब, सुकृत पुरातन उदित भए तब॥बूढ़ा बैल सवारी जिनकी, महिमा का गावे कोउ तिनकी।सदा श्मशान बिहारी शंकर, आभूषण हैं भुजंग भयंकर॥कण्ठ हलाहल को छबि छायी, नीलकण्ठ की पदवी पायी।देव मगन के हित अस किन्हो, विष लै आपु तिनहि अमि दिन्हो॥ताकी, तुम पत्नी छवि धारिणी, दुरित विदारिणी मंगल कारिणी।देखि परम सौंदर्य तिहारो, त्रिभुवन चकित बनावन हारो॥भय भीता सो माता गंगा, लज्जा मय है सलिल तरंगा।सौत समान शम्भू पहआयी, विष्णु पदाब्ज छोड़ि सो धायी॥तेहि कों कमल बदन मुरझायो, लखी सत्वर शिव शीश चढ़ायो। नित्यानंद करी बरदायिनी, अभय भक्त कर नित अनपायिनी॥अखिल पाप त्रयताप निकन्दिनी, माहेश्वरी, हिमालय नन्दिनी। काशी पुरी सदा मन भायी, सिद्ध पीठ तेहि आपु बनायी॥भगवती प्रतिदिन भिक्षा दात्री, कृपा प्रमोद सनेह विधात्री।रिपुक्षय कारिणी जय जय अम्बे, वाचा सिद्ध करि अवलम्बे॥गौरी उमा शंकरी काली, अन्नपूर्णा जग प्रतिपाली।सब जन की ईश्वरी भगवती, पतिप्राणा परमेश्वरी सती॥तुमने कठिन तपस्या कीनी, नारद सों जब शिक्षा लीनी।अन्न न नीर न वायु अहारा, अस्थि मात्रतन भयउ तुम्हारा॥पत्र घास को खाद्य न भायउ, उमा नाम तब तुमने पायउ।तप बिलोकी ऋषि सात पधारे, लगे डिगावन डिगी न हारे॥तब तव जय जय जय उच्चारेउ, सप्तऋषि, निज गेह सिद्धारेउ।सुर विधि विष्णु पास तब आए, वर देने के वचन सुनाए॥मांगे उमा वर पति तुम तिनसों, चाहत जग त्रिभुवन निधि जिनसों।एवमस्तु कही ते दोऊ गए, सुफल मनोरथ तुमने लए॥करि विवाह शिव सों हे भामा, पुनः कहाई हर की बामा।जो पढ़िहै जन यह चालीसा, धन जन सुख देइहै तेहि ईसा॥बाल वनिता महिला आश्रम॥ दोहा ॥कूटि चंद्रिका सुभग शिर, जयति जयति सुख खानिपार्वती निज भक्त हित, रहहु सदा वरदानि।

     (श्री पार्वती माता की चालीसा)                                   ॥दोहा॥ जय गिरी तनये दक्षजे शम्भू प्रिये गुणखानि। गणपति जननी पार्वती अम्बे! शक्ति! भवानि॥ ॥चौपाई॥ ब्रह्मा भेद न तुम्हरो पावे, पंच बदन नित तुमको ध्यावे। षड्मुख कहि न सकत यश तेरो, सहसबदन श्रम करत घनेरो॥ तेऊ पार न पावत माता, स्थित रक्षा लय हित (हिय) सजाता। अधर प्रवाल सदृश अरुणारे, अति कमनीय नयन कजरारे॥ ललित ललाट विलेपित केशर, कुंकुंम अक्षत शोभा मनहर। कनक बसन कंचुकि सजाए, कटी मेखला दिव्य लहराए॥ कंठ मदार हार की शोभा, जाहि देखि सहजहि मन लोभा। बालारुण अनंत छबि धारी, आभूषण की शोभा प्यारी॥ नाना रत्न जड़ित सिंहासन, तापर राजति हरि चतुरानन। इन्द्रादिक परिवार पूजित, जग मृग नाग यक्ष रव कूजित॥ गिर कैलास निवासिनी जय जय, कोटिक प्रभा विकासिन जय जय। त्रिभुवन सकल कुटुंब तिहारी, अणु अणु महं तुम्हारी उजियारी॥ हैं महेश प्राणेश तुम्हारे, त्रिभुवन के जो नित रखवारे। उनसो पति तुम प्राप्त कीन्ह जब, सुकृत पुरातन उदित भए तब॥ बूढ़ा बैल सवारी जिनकी,...

श्री भरेव चालीसा॥दोहा॥विश्वनाथ को सुमिरि मन, धर गणेश का ध्यान।भैरव चालीसा रचु, कृपा करहु भगवान॥बटुकनाथ भैरव भजं, श्री काली के लाल।छीतरमल पर कृपा कर, काशी के कुतवाल॥ By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब॥चौपाई॥जय जय श्री काली के लाला, रहो दास पर सदा दयाला।भैरव भीषण भीम कपाली, क्रोधवंत लोचन में लाली॥कर त्रिशूल है कठिन कराला, गल में प्रभु मुंडन की माला।कृष्ण रूप तन वर्ण विशाला, पीकर मद रहता मतवाला॥रूद्र बटुक भक्तन के संगी, प्रेतनाथ भूतेश भुजंगी।त्रैल तेश है नाम तुम्हारा, चक्र तुन्ड अमरेश पियारा॥शेखर चन्द्र कपाल विराजे, स्वान सवारी पै प्रभु गाजे।शिव नकुलेश चंड हो स्वामी, बैजनाथ प्रभु नमो नमामी॥अश्वनाथ क्रोधेश बखाने, भैरों काल जगत ने जाने।गायत्री कहे निमिष दिगंबर, जगन्नाथ उन्नत आडम्बर॥क्षेत्रपाल दसपाण कहाए, मंजुल उमानंद कहलाये।चक्रनाथ भक्तन हितकारी, कहे त्रयम्बक सब नर नारी॥संहारक सुनन्द तव नामा, करहु भक्त के पूरण कामा।नाथ पिशाचन के हो प्यारे, संकट मेटहू सकल हमारे॥कृत्यायू सुन्दर आनंदा, भक्तन जनन के काटहु फन्दा।कारन लम्ब आप भय भंजन, नमो नाथ जय जनजन (जनमन) रंजन॥हो तुम देव त्रिलोचन नाथा, भक्त चरण में नावत माथा।त्वं अशतांग रूद्र के लाला, महाकाल कालों के काला॥ताप विमोचन अरिदल नासा, भाल चन्द्रमा करहि प्रकाशा।श्वेत काल अरु लाल शरीरा, मस्तक मुकुट शीश पर चीरा॥काली के लाला बलधारी, कहां तक शोभा कहूँ तुम्हारी।शंकर के अवतार कृपाला, रहो चकाचक पी मद प्याला॥काशी के कुतवाल कहाओ, बटुकनाथ चेटक दिखलाओ।रवि के दिन जन भोग लगावें, धुप दीप नैवेद्य चढ़ावें॥दर्शन कर के भक्त सिहावें, दारूड़ा की धर पियावें।मठ में सुन्दर लटकत झावा, सिद्ध कार्य करो भैरों बाबा॥नाथ आपका यश नहीं थोड़ा, कर में शुभग सुशोभित कोड़ा।कटी घूंघरा सूरीले बाजत, कंचन के सिंहासन राजत॥नर नारी सब तुमको ध्यावहिं, मन वांछित इक्छा फल पावहिं।भोपा है आप के पुजारी, करें आरती सेवा भारी॥भैरव भात आप का गाऊं, बार बार पद शीश नवाऊं।आपही वारे छीजन धाये, ऐलादी ने रुदन मचाये॥बहन त्यागी भाई कहां जावे, तो बिन को मोहि भात पिन्हावे।रोये बटुकनाथ करुणा कर, गये हिवारे मैं तुम जाकर॥दुखित भई ऐलादी बाला, तब हर का सिंहासन हाला।समय ब्याह का जिस दिन आया, प्रभु ने तुमको तुरत पठाया॥विष्णु कही मत विलम्ब लगाओ, तीन दिवस को भैरव जाओ।दल पठान संग लेकर धाया, ऐलादी को भात पिन्हाया॥पूरण आस बहिन की किन्ही, सुर्ख चुंदरी सिर धरी दीन्ही।भात भरा लौटे गुणग्रामी, नमो नमामी अंतर्यामी॥॥दोहा॥जय जय जय भैरव बटुक, स्वामी संकट टार।कृपा दास पर कीजिये, शंकर के अवतार॥जो यह चालीसा पढ़े, प्रेम सहित सत बार। उस घर सर्वानन्द हो, वैभव बढे़ अपार॥

श्री भरेव चालीसा ॥दोहा॥ विश्वनाथ को सुमिरि मन, धर गणेश का ध्यान। भैरव चालीसा रचु, कृपा करहु भगवान॥ बटुकनाथ भैरव भजं, श्री काली के लाल। छीतरमल पर कृपा कर, काशी के कुतवाल॥ By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब ॥चौपाई॥ जय जय श्री काली के लाला, रहो दास पर सदा दयाला। भैरव भीषण भीम कपाली, क्रोधवंत लोचन में लाली॥ कर त्रिशूल है कठिन कराला, गल में प्रभु मुंडन की माला। कृष्ण रूप तन वर्ण विशाला, पीकर मद रहता मतवाला॥ रूद्र बटुक भक्तन के संगी, प्रेतनाथ भूतेश भुजंगी। त्रैल तेश है नाम तुम्हारा, चक्र तुन्ड अमरेश पियारा॥ शेखर चन्द्र कपाल विराजे, स्वान सवारी पै प्रभु गाजे। शिव नकुलेश चंड हो स्वामी, बैजनाथ प्रभु नमो नमामी॥ अश्वनाथ क्रोधेश बखाने, भैरों काल जगत ने जाने। गायत्री कहे निमिष दिगंबर, जगन्नाथ उन्नत आडम्बर॥ क्षेत्रपाल दसपाण कहाए, मंजुल उमानंद कहलाये। चक्रनाथ भक्तन हितकारी, कहे त्रयम्बक सब नर नारी॥ संहारक सुनन्द तव नामा, करहु भक्त के पूरण कामा। नाथ पिशाचन के हो प्यारे, संकट मेटहू सकल हमारे॥ कृत्यायू सुन्दर आनंदा, भक्तन जनन के काटहु फन्दा। कारन लम्ब आप भय भंजन, नमो नाथ ज...