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श्री गायत्री चालीसा ॥दोहा॥ ह्रीं, श्रीं क्लीं मेधा, प्रभा, जीवन ज्योति प्रचण्ड। शान्ति कान्ति, जागृति, प्रगति, रचना शक्ति अखण्ड॥ जगत जननी, मंगल करनि, गायत्री सुखधाम। प्रणवों सावित्री, स्वधा स्वाहा पूरन काम॥ बाल वनिता महिला आश्रम ॥चौपाई॥ भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी, गायत्री नित कलिमल दहनी। अक्षर चौविस परम पुनीता, इनमें बसें शास्त्र, श्रुति, गीता॥ शाश्वत सतोगुणी सत रूपा, सत्य सनातन सुधा अनूपा। हंसारूढ़ सिताम्बर धारी, स्वर्ण कान्ति शुचि गगन-बिहारी॥ पुस्तक पुष्प कमण्डलु माला, शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला। ध्यान धरत पुलकित हित होई, सुख उपजत दुःख दुर्मति खोई॥ कामधेनु तुम सुर तरु छाया, निराकार की अदभुत माया। तुम्हरी शरण गहै जो कोई, तरै सकल संकट सों सोई॥ सरस्वती लक्ष्मी तुम काली, दिपै तुम्हारी ज्योति निराली। तुम्हरी महिमा पार न पावैं, जो शारद शत मुख गुन गावैं॥ चार वेद की मात पुनीता, तुम ब्रह्माणी गौरी सीता। महामन्त्र जितने जग माहीं, कोउ गायत्री सम नाहीं॥ सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै, आलस पाप अविद्या नासै। सृष्टि बीज जग जननि भवानी, कालरात्रि वरदा कल्याणी॥ ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते, तुम सों पावें सुरता तेते। तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे, जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे॥ महिमा अपरम्पार तुम्हारी, जय जय जय त्रिपदा भयहारी। पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना, तुम सम अधिक न जगमे आना॥ तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा, तुमहिं पाय कछु रहै न कलेशा। जानत तुमहिं तुमहिं व्है जाई, पारस परसि कुधातु सुहाई॥ तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई, माता तुम सब ठौर समाई। ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड घनेरे, सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे॥ सकल सृष्टि की प्राण विधाता, पालक पोषक नाशक त्राता। मातेश्वरी दया व्रत धारी, तुम सन तरे पातकी भारी॥ जापर कृपा तुम्हारी होई, तापर कृपा करें सब कोई। मन्द बुद्धि ते बुद्धि बल पावें, रोगी रोग रहित हो जावें॥ दारिद्र मिटै कटै सब पीरा, नाशै दुःख हरै भव भीरा। गृह क्लेश चित चिन्ता भारी, नासै गायत्री भय हारी॥ सन्तति हीन सुसन्तति पावें, सुख संपति युत मोद मनावें। भूत पिशाच सबै भय खावें, यम के दूत निकट नहिं आवें॥ जो सधवा सुमिरें चित लाई, अछत सुहाग सदा सुखदाई। घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी, विधवा रहें सत्य व्रत धारी॥ जयति जयति जगदम्ब भवानी, तुम सम ओर दयालु न दानी। जो सतगुरु सो दीक्षा पावे, सो साधन को सफल बनावे॥ सुमिरन करे सुरूचि बड़भागी, लहै मनोरथ गृही विरागी। अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता, सब समर्थ गायत्री माता॥ ऋषि, मुनि, यती, तपस्वी, योगी, आरत, अर्थी, चिन्तित, भोगी। जो जो शरण तुम्हारी आवें, सो सो मन वांछित फल पावें॥ बल बुद्धि विद्या शील स्वभाउ, धन वैभव यश तेज उछाउ। सकल बढें उपजें सुख नाना, जो यह पाठ करै धरि ध्याना॥ ॥दोहा॥ यह चालीसा भक्ति युत, पाठ करै जो कोय। तापर कृपा प्रसन्नता, गायत्री की होय॥ By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब

              (  श्री गायत्री चालीसा )

                         ॥दोहा॥ 

 ह्रीं, श्रीं क्लीं मेधा, प्रभा, जीवन ज्योति प्रचण्ड। शान्ति कान्ति, जागृति, प्रगति, रचना शक्ति अखण्ड॥ जगत जननी, मंगल करनि, गायत्री सुखधाम। प्रणवों सावित्री, स्वधा स्वाहा पूरन काम॥ बाल वनिता महिला आश्रम ॥चौपाई॥ भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी, गायत्री नित कलिमल दहनी। अक्षर चौविस परम पुनीता, इनमें बसें शास्त्र, श्रुति, गीता॥ शाश्वत सतोगुणी सत रूपा, सत्य सनातन सुधा अनूपा। हंसारूढ़ सिताम्बर धारी, स्वर्ण कान्ति शुचि गगन-बिहारी॥ पुस्तक पुष्प कमण्डलु माला, शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला। ध्यान धरत पुलकित हित होई, सुख उपजत दुःख दुर्मति खोई॥ कामधेनु तुम सुर तरु छाया, निराकार की अदभुत माया। तुम्हरी शरण गहै जो कोई, तरै सकल संकट सों सोई॥ सरस्वती लक्ष्मी तुम काली, दिपै तुम्हारी ज्योति निराली। तुम्हरी महिमा पार न पावैं, जो शारद शत मुख गुन गावैं॥ चार वेद की मात पुनीता, तुम ब्रह्माणी गौरी सीता। महामन्त्र जितने जग माहीं, कोउ गायत्री सम नाहीं॥ सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै, आलस पाप अविद्या नासै। सृष्टि बीज जग जननि भवानी, कालरात्रि वरदा कल्याणी॥ ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते, तुम सों पावें सुरता तेते। तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे, जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे॥ महिमा अपरम्पार तुम्हारी, जय जय जय त्रिपदा भयहारी। पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना, तुम सम अधिक न जगमे आना॥ तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा, तुमहिं पाय कछु रहै न कलेशा। जानत तुमहिं तुमहिं व्है जाई, पारस परसि कुधातु सुहाई॥ तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई, माता तुम सब ठौर समाई। ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड घनेरे, सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे॥ सकल सृष्टि की प्राण विधाता, पालक पोषक नाशक त्राता। मातेश्वरी दया व्रत धारी, तुम सन तरे पातकी भारी॥ जापर कृपा तुम्हारी होई, तापर कृपा करें सब कोई। मन्द बुद्धि ते बुद्धि बल पावें, रोगी रोग रहित हो जावें॥ दारिद्र मिटै कटै सब पीरा, नाशै दुःख हरै भव भीरा। गृह क्लेश चित चिन्ता भारी, नासै गायत्री भय हारी॥ सन्तति हीन सुसन्तति पावें, सुख संपति युत मोद मनावें। भूत पिशाच सबै भय खावें, यम के दूत निकट नहिं आवें॥ जो सधवा सुमिरें चित लाई, अछत सुहाग सदा सुखदाई। घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी, विधवा रहें सत्य व्रत धारी॥ जयति जयति जगदम्ब भवानी, तुम सम ओर दयालु न दानी। जो सतगुरु सो दीक्षा पावे, सो साधन को सफल बनावे॥ सुमिरन करे सुरूचि बड़भागी, लहै मनोरथ गृही विरागी। अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता, सब समर्थ गायत्री माता॥ ऋषि, मुनि, यती, तपस्वी, योगी, आरत, अर्थी, चिन्तित, भोगी। जो जो शरण तुम्हारी आवें, सो सो मन वांछित फल पावें॥ बल बुद्धि विद्या शील स्वभाउ, धन वैभव यश तेज उछाउ। सकल बढें उपजें सुख नाना, जो यह पाठ करै धरि ध्याना॥ ॥दोहा॥ यह चालीसा भक्ति युत, पाठ करै जो कोय। तापर कृपा प्रसन्नता, गायत्री की होय॥
 By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब

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श्री राम जी चालीसा By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब ॥चौपाई॥श्री रघुवीर भक्त हितकारी, सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी।निशिदिन ध्यान धरै जो कोई, ता सम भक्त और नहिं होई॥ध्यान धरे शिवजी मन माहीं, ब्रह्मा इन्द्र पार नहिं पाहीं।जय, जय, जय रघुनाथ कृपाला, सदा करो संतन प्रतिपाला॥दूत तुम्हार वीर हनुमाना, जासु प्रभाव तिहूं पुर जाना।तव भुज दण्ड प्रचण्ड कृपाला, रावण मारि सुरन प्रतिपाला॥तुम अनाथ के नाथ गुंसाई, दीनन के हो सदा सहाई।ब्रह्मादिक तव पार न पावैं, सदा ईश तुम्हरो यश गावैं॥चारिउ वेद भरत हैं साखी, तुम भक्तन की लज्जा राखीं।गुण गावत शारद मन माहीं, सुरपति ताको पार न पाहीं॥नाम तुम्हार लेत जो कोई, ता सम धन्य और नहिं होई।राम नाम है अपरम्पारा, चारिहु वेदन जाहि पुकारा॥गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो, तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो।शेष रटत नित नाम तुम्हारा, महि को भार शीश पर धारा॥फूल समान रहत सो भारा, पाव न कोऊ तुम्हारो पारा।भरत नाम तुम्हरो उर धारो, तासों कबहुं न रण में हारो॥नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा, सुमिरत होत शत्रु कर नाशा।लखन तुम्हारे आज्ञाकारी, सदा करत सन्तन रखवारी॥ताते रण जीते नहिं कोई, युद्ध जुरे यमहूं किन होई।महालक्ष्मी धर अवतारा, सब विधि करत पाप को छारा॥सीता नाम पुनीता गायो, भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो।घट सों प्रकट भई सो आई, जाको देखत चन्द्र लजाई॥सो तुमरे नित पांव पलोटत, नवो निद्धि चरणन में लोटत।सिद्धि अठारह मंगलकारी, सो तुम पर जावै बलिहारी॥औरहु जो अनेक प्रभुताई, सो सीतापति तुमहिं बनाई।इच्छा ते कोटिन संसारा, रचत न लागत पल की बारा॥जो तुम्हरे चरणन चित लावै, ताकी मुक्ति अवसि हो जावै।जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूपा, निर्गुण ब्रह्म अखण्ड अनूपा॥सत्य सत्य सत्य व्रत स्वामी, सत्य सनातन अन्तर्यामी।सत्य भजन तुम्हरो जो गावै, सो निश्चय चारों फल पावै॥सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं, तुमने भक्तिहिं सब सिद्धि दीन्हीं।सुनहु राम तुम तात हमारे, तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे॥तुमहिं देव कुल देव हमारे, तुम गुरु देव प्राण के प्यारे।जो कुछ हो सो तुम ही राजा, जय जय जय प्रभु राखो लाजा॥राम आत्मा पोषण हारे, जय जय जय दशरथ के दुलारे।ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरूपा, नमो नमो जय जगपति भूपा॥धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा, नाम तुम्हार हरत संतापा।सत्य शुद्ध देवन मुख गाया, बजी दुन्दुभी शंख बजाया॥सत्य सत्य तुम सत्य सनातन, तुम ही हो हमरे तन मन धन।याको पाठ करे जो कोई, ज्ञान प्रकट ताके उर होई॥आवागमन मिटै तिहि केरा, सत्य वचन माने शिर मेरा।और आस मन में जो होई, मनवांछित फल पावे सोई॥तीनहुं काल ध्यान जो ल्यावै, तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै।साग पत्र सो भोग लगावै, सो नर सकल सिद्धता पावै॥अन्त समय रघुवरपुर जाई, जहां जन्म हरि भक्त कहाई।श्री हरिदास कहै अरु गावै, सो बैकुण्ठ धाम को जावै॥॥दोहा॥सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय।हरिदास हरि कृपा से, अवसि भक्ति को पाय॥राम चालीसा जो पढ़े, राम चरण चित लाय।जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्ध हो जाय॥

श्री राम जी चालीसा By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब ॥चौपाई॥ श्री रघुवीर भक्त हितकारी, सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी। निशिदिन ध्यान धरै जो कोई, ता सम भक्त और नहिं होई॥ ध्यान धरे शिवजी मन माहीं, ब्रह्मा इन्द्र पार नहिं पाहीं। जय, जय, जय रघुनाथ कृपाला, सदा करो संतन प्रतिपाला॥ दूत तुम्हार वीर हनुमाना, जासु प्रभाव तिहूं पुर जाना। तव भुज दण्ड प्रचण्ड कृपाला, रावण मारि सुरन प्रतिपाला॥ तुम अनाथ के नाथ गुंसाई, दीनन के हो सदा सहाई। ब्रह्मादिक तव पार न पावैं, सदा ईश तुम्हरो यश गावैं॥ चारिउ वेद भरत हैं साखी, तुम भक्तन की लज्जा राखीं। गुण गावत शारद मन माहीं, सुरपति ताको पार न पाहीं॥ नाम तुम्हार लेत जो कोई, ता सम धन्य और नहिं होई। राम नाम है अपरम्पारा, चारिहु वेदन जाहि पुकारा॥ गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो, तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो। शेष रटत नित नाम तुम्हारा, महि को भार शीश पर धारा॥ फूल समान रहत सो भारा, पाव न कोऊ तुम्हारो पारा। भरत नाम तुम्हरो उर धारो, तासों कबहुं न रण में हारो॥ नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा, सुमिरत होत शत्रु कर नाशा। लखन तुम्हारे आज्ञाकारी, सदा करत सन्तन रखवारी...

(श्री पार्वती माता की चालीसा) ॥दोहा॥जय गिरी तनये दक्षजे शम्भू प्रिये गुणखानि।गणपति जननी पार्वती अम्बे! शक्ति! भवानि॥॥चौपाई॥ब्रह्मा भेद न तुम्हरो पावे, पंच बदन नित तुमको ध्यावे।षड्मुख कहि न सकत यश तेरो, सहसबदन श्रम करत घनेरो॥तेऊ पार न पावत माता, स्थित रक्षा लय हित (हिय) सजाता।अधर प्रवाल सदृश अरुणारे, अति कमनीय नयन कजरारे॥ललित ललाट विलेपित केशर, कुंकुंम अक्षत शोभा मनहर।कनक बसन कंचुकि सजाए, कटी मेखला दिव्य लहराए॥कंठ मदार हार की शोभा, जाहि देखि सहजहि मन लोभा।बालारुण अनंत छबि धारी, आभूषण की शोभा प्यारी॥नाना रत्न जड़ित सिंहासन, तापर राजति हरि चतुरानन।इन्द्रादिक परिवार पूजित, जग मृग नाग यक्ष रव कूजित॥गिर कैलास निवासिनी जय जय, कोटिक प्रभा विकासिन जय जय।त्रिभुवन सकल कुटुंब तिहारी, अणु अणु महं तुम्हारी उजियारी॥हैं महेश प्राणेश तुम्हारे, त्रिभुवन के जो नित रखवारे।उनसो पति तुम प्राप्त कीन्ह जब, सुकृत पुरातन उदित भए तब॥बूढ़ा बैल सवारी जिनकी, महिमा का गावे कोउ तिनकी।सदा श्मशान बिहारी शंकर, आभूषण हैं भुजंग भयंकर॥कण्ठ हलाहल को छबि छायी, नीलकण्ठ की पदवी पायी।देव मगन के हित अस किन्हो, विष लै आपु तिनहि अमि दिन्हो॥ताकी, तुम पत्नी छवि धारिणी, दुरित विदारिणी मंगल कारिणी।देखि परम सौंदर्य तिहारो, त्रिभुवन चकित बनावन हारो॥भय भीता सो माता गंगा, लज्जा मय है सलिल तरंगा।सौत समान शम्भू पहआयी, विष्णु पदाब्ज छोड़ि सो धायी॥तेहि कों कमल बदन मुरझायो, लखी सत्वर शिव शीश चढ़ायो। नित्यानंद करी बरदायिनी, अभय भक्त कर नित अनपायिनी॥अखिल पाप त्रयताप निकन्दिनी, माहेश्वरी, हिमालय नन्दिनी। काशी पुरी सदा मन भायी, सिद्ध पीठ तेहि आपु बनायी॥भगवती प्रतिदिन भिक्षा दात्री, कृपा प्रमोद सनेह विधात्री।रिपुक्षय कारिणी जय जय अम्बे, वाचा सिद्ध करि अवलम्बे॥गौरी उमा शंकरी काली, अन्नपूर्णा जग प्रतिपाली।सब जन की ईश्वरी भगवती, पतिप्राणा परमेश्वरी सती॥तुमने कठिन तपस्या कीनी, नारद सों जब शिक्षा लीनी।अन्न न नीर न वायु अहारा, अस्थि मात्रतन भयउ तुम्हारा॥पत्र घास को खाद्य न भायउ, उमा नाम तब तुमने पायउ।तप बिलोकी ऋषि सात पधारे, लगे डिगावन डिगी न हारे॥तब तव जय जय जय उच्चारेउ, सप्तऋषि, निज गेह सिद्धारेउ।सुर विधि विष्णु पास तब आए, वर देने के वचन सुनाए॥मांगे उमा वर पति तुम तिनसों, चाहत जग त्रिभुवन निधि जिनसों।एवमस्तु कही ते दोऊ गए, सुफल मनोरथ तुमने लए॥करि विवाह शिव सों हे भामा, पुनः कहाई हर की बामा।जो पढ़िहै जन यह चालीसा, धन जन सुख देइहै तेहि ईसा॥बाल वनिता महिला आश्रम॥ दोहा ॥कूटि चंद्रिका सुभग शिर, जयति जयति सुख खानिपार्वती निज भक्त हित, रहहु सदा वरदानि।

     (श्री पार्वती माता की चालीसा)                                   ॥दोहा॥ जय गिरी तनये दक्षजे शम्भू प्रिये गुणखानि। गणपति जननी पार्वती अम्बे! शक्ति! भवानि॥ ॥चौपाई॥ ब्रह्मा भेद न तुम्हरो पावे, पंच बदन नित तुमको ध्यावे। षड्मुख कहि न सकत यश तेरो, सहसबदन श्रम करत घनेरो॥ तेऊ पार न पावत माता, स्थित रक्षा लय हित (हिय) सजाता। अधर प्रवाल सदृश अरुणारे, अति कमनीय नयन कजरारे॥ ललित ललाट विलेपित केशर, कुंकुंम अक्षत शोभा मनहर। कनक बसन कंचुकि सजाए, कटी मेखला दिव्य लहराए॥ कंठ मदार हार की शोभा, जाहि देखि सहजहि मन लोभा। बालारुण अनंत छबि धारी, आभूषण की शोभा प्यारी॥ नाना रत्न जड़ित सिंहासन, तापर राजति हरि चतुरानन। इन्द्रादिक परिवार पूजित, जग मृग नाग यक्ष रव कूजित॥ गिर कैलास निवासिनी जय जय, कोटिक प्रभा विकासिन जय जय। त्रिभुवन सकल कुटुंब तिहारी, अणु अणु महं तुम्हारी उजियारी॥ हैं महेश प्राणेश तुम्हारे, त्रिभुवन के जो नित रखवारे। उनसो पति तुम प्राप्त कीन्ह जब, सुकृत पुरातन उदित भए तब॥ बूढ़ा बैल सवारी जिनकी,...

श्री भरेव चालीसा॥दोहा॥विश्वनाथ को सुमिरि मन, धर गणेश का ध्यान।भैरव चालीसा रचु, कृपा करहु भगवान॥बटुकनाथ भैरव भजं, श्री काली के लाल।छीतरमल पर कृपा कर, काशी के कुतवाल॥ By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब॥चौपाई॥जय जय श्री काली के लाला, रहो दास पर सदा दयाला।भैरव भीषण भीम कपाली, क्रोधवंत लोचन में लाली॥कर त्रिशूल है कठिन कराला, गल में प्रभु मुंडन की माला।कृष्ण रूप तन वर्ण विशाला, पीकर मद रहता मतवाला॥रूद्र बटुक भक्तन के संगी, प्रेतनाथ भूतेश भुजंगी।त्रैल तेश है नाम तुम्हारा, चक्र तुन्ड अमरेश पियारा॥शेखर चन्द्र कपाल विराजे, स्वान सवारी पै प्रभु गाजे।शिव नकुलेश चंड हो स्वामी, बैजनाथ प्रभु नमो नमामी॥अश्वनाथ क्रोधेश बखाने, भैरों काल जगत ने जाने।गायत्री कहे निमिष दिगंबर, जगन्नाथ उन्नत आडम्बर॥क्षेत्रपाल दसपाण कहाए, मंजुल उमानंद कहलाये।चक्रनाथ भक्तन हितकारी, कहे त्रयम्बक सब नर नारी॥संहारक सुनन्द तव नामा, करहु भक्त के पूरण कामा।नाथ पिशाचन के हो प्यारे, संकट मेटहू सकल हमारे॥कृत्यायू सुन्दर आनंदा, भक्तन जनन के काटहु फन्दा।कारन लम्ब आप भय भंजन, नमो नाथ जय जनजन (जनमन) रंजन॥हो तुम देव त्रिलोचन नाथा, भक्त चरण में नावत माथा।त्वं अशतांग रूद्र के लाला, महाकाल कालों के काला॥ताप विमोचन अरिदल नासा, भाल चन्द्रमा करहि प्रकाशा।श्वेत काल अरु लाल शरीरा, मस्तक मुकुट शीश पर चीरा॥काली के लाला बलधारी, कहां तक शोभा कहूँ तुम्हारी।शंकर के अवतार कृपाला, रहो चकाचक पी मद प्याला॥काशी के कुतवाल कहाओ, बटुकनाथ चेटक दिखलाओ।रवि के दिन जन भोग लगावें, धुप दीप नैवेद्य चढ़ावें॥दर्शन कर के भक्त सिहावें, दारूड़ा की धर पियावें।मठ में सुन्दर लटकत झावा, सिद्ध कार्य करो भैरों बाबा॥नाथ आपका यश नहीं थोड़ा, कर में शुभग सुशोभित कोड़ा।कटी घूंघरा सूरीले बाजत, कंचन के सिंहासन राजत॥नर नारी सब तुमको ध्यावहिं, मन वांछित इक्छा फल पावहिं।भोपा है आप के पुजारी, करें आरती सेवा भारी॥भैरव भात आप का गाऊं, बार बार पद शीश नवाऊं।आपही वारे छीजन धाये, ऐलादी ने रुदन मचाये॥बहन त्यागी भाई कहां जावे, तो बिन को मोहि भात पिन्हावे।रोये बटुकनाथ करुणा कर, गये हिवारे मैं तुम जाकर॥दुखित भई ऐलादी बाला, तब हर का सिंहासन हाला।समय ब्याह का जिस दिन आया, प्रभु ने तुमको तुरत पठाया॥विष्णु कही मत विलम्ब लगाओ, तीन दिवस को भैरव जाओ।दल पठान संग लेकर धाया, ऐलादी को भात पिन्हाया॥पूरण आस बहिन की किन्ही, सुर्ख चुंदरी सिर धरी दीन्ही।भात भरा लौटे गुणग्रामी, नमो नमामी अंतर्यामी॥॥दोहा॥जय जय जय भैरव बटुक, स्वामी संकट टार।कृपा दास पर कीजिये, शंकर के अवतार॥जो यह चालीसा पढ़े, प्रेम सहित सत बार। उस घर सर्वानन्द हो, वैभव बढे़ अपार॥

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